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Wednesday, 13 August 2014

भ्रष्टाचार


कभी प्रशासनिक,
 तो कभी शैक्षिक| 
भ्रष्टाचार का विशाल दायरा...
बढता जा रहा है। 
कालाबजारी , मुनाफखोरिओं से पाला 
पडते जा रहा है |

Wednesday, 11 June 2014

मनुष्य और प्रकृति


नर से नारायण हो
या फ़िर
नारायण से नर 
है दिवास्वप्न ये क्या

सामर्थ बेशक होगा तुझमें
पत्थर को पिघलाने का

Wednesday, 21 May 2014

युवा जागरण


युवा है तो वायु बन,
जीत जा जीवन का रण ।
बेशक जोश से तू कम कर ,
पर स्व-विवेक का भी तो ध्यान रख ।

Tuesday, 20 May 2014

मानव निर्मित प्रकृति

रचना ये अद्भुत 
ये प्रकृति एक देन है.
पर क्या यही वो देन है,
जिसकी संरचना की गई थी?
जी हाँ ये प्रकृति तो वही है
परन्तु बहुत कुछ बदल गया है

Monday, 19 May 2014

एक धीमा जहर

समय व लोग ,
सभी साक्षी हैं
अनेकों जीवन नष्ट हुए हैं 
तो कई पच्छतावे में
जी रहें हैं .!
फिर भी नशा.. आकर्षण रहा है युवाओं का

Sunday, 18 May 2014

भ्रष्टाचार

        भारत की धरती पर 
         सबसे बड़ा कलंक 
       भ्रष्टाचार हमारे देश का 
        सबसे बड़ा आतंक 
        हर नए सवेरे के साथ हममे   
      भ्रष्टाचार रोकने को अंतर्द्वंद 
      फिर भी भ्रष्टाचार हमारे देश का  

Saturday, 17 May 2014

विकल्प नहीं संकल्प कीजिये


 सिहर रही सारी मानवता 
 धरती पर है भव दानवता 
 निर्मल उज्वल श्यामल धरती,
 हर दम यही पुकार है करती
 इतना पापी न बन ऐ मानव
 इंसान बन ना बन दानव 

Friday, 16 May 2014

भर हुंकार

आज जाग युवा की देश की यही पुकार है,
तू ही तो है, जो देश का कर्णधार है. 

आज जाग देख की इन भ्रष्टो को जगाना है
दूषित भारत भूमि को आज,

Thursday, 15 May 2014

एक दरिया

चली थी जब वो दुनिया नापने, 
पता न था एक दरिया होगा 
राह में, जिसको पार करना 
बिलकुल भी आसान न होगा.

दर्द थे उसमे भरे पड़े,
खतरे भी थे बड़े बड़े


Monday, 12 May 2014

दोष जरूर दीजिये- पर मतदान के बाद

 कल भी मौन थे.. 
 आज भी खामोश हैं..
 सरकारी तंत्र से दूर
 बस आज भी नेताओ को,
 दोष देने में मशगूल हैं.

जननी का सम्मान

 माटी की ऐसी मूरत थी वो ..
 सबसे प्यारी सूरत थी जो ..
 ईश्वर ने जिसपर हाथ रखा .. 
 निर्माण का उसे वरदान दिया .. 
 चहकती थी .. जब हस्ती थी .. 
 उपवन उपवन आती थी बहार ..
 महक उठते सब मौसम त्यौहार ..

Sunday, 11 May 2014

प्रयास है छोटा सा

                                                  
प्रयास है छोटा सा 
 एक छोटी सी कोशिश बदलाव की ... 
उम्मीद की लौ भी हलकी है जानते हैं .. 
फिर भी कोशिश है इस समय के विद्वानो को जगाने की
कुछ  समानताओं  से  अवगत  कराने  की ..
अहम  की  पट्टी  हटा  कर 

Friday, 9 May 2014

कोशिश तो कीजिये



वो  नन्ही  सी  जान  जिसके  नाजुक  कंधो  पर 
पूरे  परिवार  का  बोझ  डाल  दिया जाता  है 
जिसके  अरमानो  को  उसी  की  नज़रो  के  सामने  
 कुचल  दिया   जाता  है  
जिससे  खुली  आँखों  से  ख्वाब  देखने  का  अधिकार  भी  
 दूर  कर  दिया  गया  है 
 इस  समाज  की  यह  कैसी  नीति  है   
 सती  प्रथा  जैसी  कुरीतियों  से 


क्या आज आप जागेंगे !!!


है यह जघन्य अपराध नहीं
तो इससे बड़ा गुनाह तुम क्या लोगे!!
आज भी रहे मौन अगर तो 
अपने अंतर्मन से क्या कहोगे??
आज भी जगे नहीं तो अपने स्वप्न नगर का क्या करोगे?? 
यहाँ  एक  नहीं ..कई  मिटी  हैं 
कई  दामिनी  शर्मसार  हुई  हैं